क्या चल रहा है?

भिलाई शहर में 1.28 लाख मकान जबकि राशन कार्ड बन गए 1.33 लाख, लॉकडाउन में ही 8 हजार कार्ड बने

  • लॉकडाउन के दौरान एक-एक घर में बन गए 3-3 राशन कार्ड, जिले में बने 12374 नए कार्ड
  • जिले में बिना क्रॉस चेक किए जिसका चाहे उसका बना रहे राशन कार्ड

दुर्ग. लॉकडाउन के बीच मनमाने राशन कार्ड बनाए जा रहे हैं। क्रॉस चेक भी नहीं हो रहा है कि जिसका राशन कार्ड बन रहा है वह कहां रहता है? आवेदन आते ही कार्ड बनाए जा रहे हैं। तभी तो भिलाई शहर में 1.28 लाख मकान है, लेकिन यहां राशन कार्ड 1.33 लाख बन गए हैं। यानि जितने मकान है उससे कहीं ज्यादा। यही हाल दुर्ग शहर का है। यहां 64000 के आसपास मकान है लेकिन राशन कार्ड 64800 के आसपास बन गए हैं। यानि दुर्ग के हर घर में राशन कार्ड है। भिलाई और दुर्ग में मकानों से ज्यादा राशन कार्ड कैसे बन गए? यह अधिकारियों ने भी नहीं सोचा। लेकिन इससे कई सवाल जरूर खड़े हो गए हैं। आखिर कैसे मकानों से ज्यादा राशन कार्ड बन सकते हैं? कई सवाल उठ रहे हैं और संदेहों को भी जन्म दे रहा है।
लॉकडाउन के बाद आंकड़े सबसे ज्यादा बढ़ गए हैं। दुर्ग जिले में 12 हजार 374 नए राशनकार्ड इस लॉकडाउन के दौरान बनाए गए हैं। जिले में 4 लाख 36 हजार राशनकार्ड पहले से ही हैं।

लॉकडाउन में नए कार्ड बनाने की घोषणा का असर

एक घर में तीन-तीन राशनकार्ड: नए राशन कार्ड बनाने का ऐसा असर हुआ कि एक ही घर में तीन-तीन कार्ड बना लिए। उसे आप ऐसे समझ सकते हैं, एक परिवार में 6 सदस्य थे। उन्हें पहले 42 किलो राशन मिल रहा था। ऐसे कई लोग अब परिवार से अलग होकर राशनकार्ड बनवा लिए हैं। दो-दो सदस्यों के तीन राशनकार्ड बना हो गए। तीन राशनकार्ड के हिसाब से प्रति सदस्य 10 किलो राशन पाने के दायरे में आ गए। इस तरह प्रति राशन कार्ड 20-20 किलों के हिसाब से 60 किलो चावल मिलेंगे।

आधार नंबर से हो सकता है खेल: एक हितग्राही के राशनकार्ड में चार सदस्य  हैं। सभी सदस्यों का आधार नंबर लिंक हैं। दुकानदार इसमें से एक या दो सदस्य का आधार नंबर अलग कर दूसरे हितग्राही के सदस्य संख्या में जोड़ देंगे। इन दोनों जोड़े हुए सदस्यों का राशन वे ऑनलाइन फोटो सिस्टम से निकाल लेंगे। ऐसा पहले भी हो चुका है। इसलिए गड़बड़ी को अंजाम देना आसान भी है। इसकी मॉनीटरिंग भी नहीं हो रही है।

राशन के लिए अलग हो रहे परिवार: सरकारी राशन लेने के लिए लोग अपने परिवार से अलग होने लगे हैं और अलग से राशनकार्ड बनवा लिए। मसलन गयानगर के वेदप्रकाश निर्मलकर का  एक ही राशनकार्ड में नाम था अब उसने अलग कार्ड बना लिया। राजीवनगर की भुनेश्वरी यादव, उर्वशी यादव और गयानगर की रानी ठाकुर ने परिवार से अलग राशनकार्ड बना लिए। दुर्ग-भिलाई में ऐसे कई परिवार है जो कार्ड बनाने ऐसा कर रहे हैं।

पलायन करने वाले भी बनाए कार्ड: सिकोलाभाठा में निषा राजपूत पहले दूसरी जगह काम करने गई थी अब यहां आई है। राजनांदगांव जिले में काम करने गई गौरी वर्मा यहां लौट आई है और उसने  राशनकार्ड के लिए आवेदन दिया है। गंडई से दुर्ग लौटी पूनम सोनी नया राशनकार्ड बनवा रही है। इन लोगों ने अपने आधार पर पते सुधरवाए और अब यहां निवासरत रहने की वजह से राशनकार्ड बनवाए।
पहले मिली है गड़बड़ी, इस बार माॅनीटरिंग नहीं
राशन कार्ड में गड़बड़ी का यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी इस तरह के मामले सामने आ चुके हैं। इस बार तो मॉनीटरिंग भी नहीं हो रही है। विभाग भी मौन है।

सबसे नया

To Top
//stawhoph.com/afu.php?zoneid=3256832