क्या चल रहा है?

परिवार दर-दर भटका, मां के गहने बिक गए, अब इंजीनियर बनकर एमएनसी में पाई नौकरी

  • कोरोना संकट के बीच विपरीत परिस्थितियों में जीत की कहानीसुपर-30 के आनंद कुमार के शब्दों में

 

जिंदगी के उतार-चढ़ावों से भरी कहानी है राहुल और उसके पिता राजू शर्मा की। राजू अपना पुश्तैनी बढ़ईगिरी का काम नहीं करना चाहते थे। पढ़ने का मन था। मगर पांच बहनों और चार भाइयों के परिवार में पढ़ने का ख्वाब तब टूट ही गया जब उनकी शादी कर दी गई। दो बच्चे हो गए। उन्हें बिहार के गया शहर आना पड़ा। तब उन्होंने टाइपराइटर चलाना सीखा। टाइप करके जो भी कमाते उससे घर चलता। अब उनका सपना था कि बेटा राहुल पढ़े। आगे बढ़े। राहुल मोहल्ले के ही एक स्कूल में दाखिल हो गया। खूब पढ़ता। पिता की खुशी देखते ही बनती।

उन्हीं दिनों कम्प्यूटर आया। टाइपराइटर बेकार हो गया। घर में खाने के लाले पड़ने लगे। हालात को देखकर राजू ने कहीं से पैसे जुगाड़े और एक कम्प्यूटर ले लिया। लगा कि गाड़ी पटरी पर आ जाएगी मगर हुआ उल्टा। उन दिनों में कुछ गुंडे राजू के पास आ धमके। रंगदारी मांगने लगे। राजू ने मिन्नतें कीं। घर की हालत बताई। किसी ने सुना नहीं। गुंडों ने एक दिन का वक्त दिया। मदद की आस में वे पुलिस के पास गए। पुलिस ने उन्हें कुछ ले-देकर मामला निपटाने को कहा। राजू बहुत हताश थे। बेटा उनके तनाव को देख रहा था। सुबह चार बजे उन्होंने गया छोड़ने का निर्णय लिया। वे कुछ जरूरी सामान पोटलियों में बांधकर पटना पहुंचे। रोजगार। घर। राहुल की पढ़ाई अधर में थी। राहुल की मां रजनी ने अपने गहने बेचे। बच्चों को पास के ही एक स्कूल में दाखिला मिल गया।

राजू ने छोटे-मोटे काम शुरू किए मगर बात बनी नहीं। हारकर उन्होंने अपना पुश्तैनी काम संभाला। एक नए बढ़ई के लिए भी रास्ता आसान नहीं था। काम का संकट बना ही रहा। उस बुरे हाल में भी राहुल मन लगाकर पढ़ता। वह आठवीं पास हो गया। अब कहानी में आते हैं सुरेश कांत। एक नेकदिल पड़ोसी। छोटी सी प्रिंटिंग प्रेस के मालिक। उनका ध्यान खींचा राहुल ने, जो सुबह, शाम और रात, हर समय उन्हें बरामदे में बैठा पढ़ता ही मिलता। सुरेशजी ने सोचा कि यह बच्चा सोता कब है? राहुल के पिता से मुलाकात में जब उन्हें उनके घर की हालत का पता चला तो वे भी भावुक हो गए। उन्होंने राजू को प्रिंटिंग प्रेस में नौकरी का प्रस्ताव दे दिया। राहुल के लिए कॉपी-किताबें और फीस की मदद मिल गई। राहुल अच्छे अंकों से दसवीं पास हो गया। सुरेशजी ने ही उसे सुपर 30 का रास्ता बताया। 2008 में एक दिन राजू-राहुल मेरे सामने थे। हालात ने राजू को ऐसी विनम्रता दी कि पत्थर का कलेजा भी पिघल जाए। भरी आंखों से मैंने उनके होनहार बेटे को अपनाया। अब पढ़ाई के साथ खाने-पीने के खर्चे की चिंताओं से वे मुक्त थे। वह गणित में गजब की काबिलियत वाला बच्चा था। अपने सहपाठियों का हर मौके पर मददगार।

धूप के बाद छांव कब तक नहीं आती। 2009 में आईआईटी के रिजल्ट ने राजू शर्मा के परिवार को जिंदगी की सबसे बड़ी खुशखबरी दी। राहुल ने शानदार रैंक पाई थी। सुरेशकांत प्रेस में मिठाई बांट रहे थे। एक योग्य बालक को उड़ान भरने का मौका मिला था। आईआईटी खड़गपुर से पढ़ाई पूरी करने के बाद गया और पटना की तंग गलियों और एक कमरे के बेरौनक घरों में पला-बढ़ा राहुल आज एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम कर रहा है।

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