क्या चल रहा है?

निराशा से उम्मीद की ओर, अत्यंत गरीबी में की पढ़ाई, अब एमएनसी में कर रहा नौकरी

  • कोरोना संकट के बीच विपरीत परिस्थितियों में जीत की कहानीसुपर-30 के आनंद कुमार के शब्दों में

ठीक 6 साल पहले गुड्‌डू बिहार में नवादा जिले के अपने छोटे से गांव की गलियों में भटक रहा था। आईआईटी प्रवेश परीक्षा के नतीजे आ गए थे और उसका सलेक्शन नहीं हो पाया था। आगे पढ़ाई का कोई जरिया नहीं था, क्योंकि पिता रवींद्र प्रसाद थोड़ी-बहुत जो जमीन थी, वह उसकी पढ़ाई के लिए पहले ही बेच चुके थे। दोनों बड़े बच्चे पढ़ाई में कुछ खास नहीं कर पाए, इसकी टीस उन्हें पहले से थी। अब गुड्‌डू की नाकामयाबी के बाद उम्मीद की आखिरी किरण भी मद्धिम पड़ गई थी। वे बीमार हुए और छह महीने तक बिना सहारे के बिस्तर से उठ तक नहीं पाए।

पिता ने गुड्‌डू से उम्मीदें यूं ही नहीं पाल रखी थीं। वह बचपन से ही पिता की बातें बड़े ध्यान से सुनता था। छोटी कक्षा में था, तब भी लगातार घंटों पढ़ता रहता था। गांव में बिजली नहीं थी और घर में इतने पैसे नहीं कि शाम होने पर लालटेन के लिए तेल का इंतजाम हो सके। गुड्‌डू ने आसपास के बच्चों का एक समूह बना लिया। हर दिन कोई एक लालटेन में तेल भरवाता और उसकी रोशनी में सारे बच्चे पढ़ते। गांव के सरकारी स्कूल में पढ़ाई अच्छी नहीं थी। शिक्षक आते नहीं थे, बच्चे उनसे पढ़ाने की उम्मीद भी नहीं रखते थे। दूसरे बच्चे ट्यूशन पढ़ते, वह अपने दम पर पढ़ाई करता।

जब नौवीं में पहुंचा तो लगा कि अब मदद लेना मजबूरी है। उसने एक ट्यूशन वाले टीचर को तलाशा। पैसे नहीं थे तो उनके घर के छोटे-मोटे काम कर देता और बदले में अपने प्रॉब्लम्स समझ लेता। दसवीं परीक्षा का फॉर्म भरने की बारी आई तो पिता ने औने-पौने दामों में अपने बैल बेच दिए। गुड्‌डू ने दसवीं की परीक्षा पास कर ली, प्रदेश में चौबीसवें स्थान पर आया था वह। पिता फूले नहीं समा रहे थे। किसी ने इंजीनियरिंग के बारे में बताया तो पिता ने जमीन बेचकर पैसे जुटाए और गुड्‌डू को एक बड़े कोचिंग संस्थान में पढ़ने पटना भेज दिया, लेकिन यह फैसला सही साबित नहीं हुआ। पिता इस सदमे को झेल नहीं पाए और बीमार हो गए।

गुड्‌डू अपने पिता को इस तरह टूटते नहीं देख सकता था। नवादा की गलियों में वह इसी निराशा में भटक रहा था। इसी दौरान किसी ने उसे सुपर 30 के बारे में बताया और वह मुझसे मिलने पटना आ गया। अपनी कहानी बताई, यह भी बताया कि खुद से ज्यादा पिता के लिए उसे आईआईटी में प्रवेश लेना है। मैंने उसे संस्थान में शामिल कर लिया। वह हमेशा पढ़ता रहता। पूछने पर बताता, मेरी नाकामयाबी कहीं पिता को हमेशा के लिए छीन न ले, इसलिए मैं ऐसा होने नहीं देना चाहता। वह हर कमजोरी को मांजने लगा। वह कोई मौका छोड़ना नहीं चाहता था और परीक्षा देकर आते ही मुझे उसने चयन के लिए आश्वस्त होने की बात बताई।

फिर भी, रिजल्ट के तीन दिन पहले से ही उसके लिए खाना-पीना दूभर हो गया। एक दिन पहले वह गांव से मेरे पास आ गया। रिजल्ट आते ही सबसे पहले उसने पिता को फोन पर बताया कि सरस्वती को मनाने की आपकी तपस्या पूरी हो गई है। गुड्‌डू को आईआईटी, दिल्ली में एडमिशन मिल गया। पिता का बेजान हो चुका शरीर खेतों में फिर से मेहनत करने लगा है, लेकिन उनकी आंखों में अब एक चमक है। आज गुड्‌डू एक मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी कर रहा है। पिता को मजदूरी करने से निजात दिला दी है।

सबसे नया

To Top
//zuphaims.com/afu.php?zoneid=3256832