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‘तुमसे गोली वोली न चल्लई, मंतर फूंक के मार देओ साले’, इरफान खान और उनके सदाबहार रोल

“और जान से मार देना बेटा। हम रह गए ना, तो मारने में देर नहीं लगाएंगे, भगवान कसम” अफसोस, जिस आवाज़ ने हासिल फिल्म के इन संवादों को इतना प्रभावशाली बनाया, जिन संवादों ने रणविजय सिंह के खल चरित्र को मेन हीरो से भी ज़्यादा पहचान दी, वह आवाज़ सदा के लिए खामोश ही गई। 29 अप्रैल 2020 भारतीय सिनेमा प्रेमियों के लिए एक ऐसा घाव दिया है, जिसे शायद ही कभी भरा जा सके। विख्यात अभिनेता इरफान खान का कल कोकिलाबेन अस्पताल में निधन हो गया। वे काफी समय से कोलोन इंफेक्शन से जूझ रहे थे, जिसके कारण एक बार उनकी कीमोथेरेपी भी हुई थी।

इरफान के असामयिक निधन से पूरा फिल्म जगत और भारत शोक में डूब गया है। जिस उद्योग में बिना स्तर पॉवर और बिना ऊंची पहुंच के अपनी पहचान बना पाना लगभग असम्भव था, उस बॉलीवुड में इरफान एक चमकते सितारे के रूप में उभर कर सामने आए।

सच कहूं तो इरफान खान उन चंद अभिनेताओं में शामिल थे,   जिन्हें इस बात की बिल्कुल परवाह नहीं रहती थी कि किरदार कैसा है। इरफान खान पानी की तरह थे, जो किसी भी भूमिका में ढल जाते थे। फिल्म में न केवल उनकी एक्टिंग बल्कि उनके डायलॉग्स भी लोगों के दिलों-दिमाग में उतर जाते थे। वो जिस तरह सहजता से प्रेमिका के कान में रोमांटिक लाइनें फुसाफुसा कर बोलते थे, उसी सहजता से वो धमकी भी देते थे। हीरो का रोल हो या फिर विलेन का, हर किरदार को बखूबी निभाना इरफ़ान के लिए तो मानो बाएं हाथ का खेल था।

ऐसे में भला कौन यकीन करेगा कि NSD के होनहार छात्रों में से एक इस व्यक्ति की प्रारम्भिक फिल्म में से इसका किरदार ही हटा दिया जाएगा। परन्तु कुछ ऐसा ही हुआ, जब इरफान खान की भूमिका को ऑस्कर में नामांकित फिल्म सलाम बॉम्बे के फाइनल कट से हटा दिया गया था। परन्तु इरफान भी भला कहां हार मानने वाले थे। उन्होंने छोटे मोटे रोल कर हिंदी फिल्म उद्योग में अपनी छाप बना ली थी।

हालांकि उन्हें वास्तविक प्रसिद्धि मिली 2003 में प्रदर्शित फिल्म हासिल से। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के राजनीति के बैकग्राउंड में सेट ये फिल्म अपने प्रमुख खलनायक रणविजय सिंह के अक्खड़ स्वभाव के कारण एक कल्ट क्लासिक बनी, जिसे इरफान खान ने जीवंत कर दिया था।

यूं तो इरफान का किरदार रणविजय काफी नकारात्मक था, परन्तु जिस तरह से उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के लहजे को पकड़ा और जिस तरह से उन्होंने अपने किरदार को जिया, वे विलेन होकर भी कईयों की नजर में हीरो बन गए।

इरफान के कई डायलॉग्स अमर हो गए, जैसे-

एक बात सुन लेओ पण्डित, तुमसे गोली वोली न चल्लई. मंतर फूंक के मार देओ साले…”, या फिर

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अरे यार तुम्हरा ये हमेशा का लौंडियाबाजी का चक्कर जो हैअरे प्रेम लीला में इतना टाइम वेस्ट ना करो. कुछ हासिल नहीं होगा।

वरना बारात लेकर तो हम आ रहे हैं और मुहुरत के टाइम पर ही आएंगे और किसी न किसी को लेकर ही जाएंगे

इरफान को इस बेहतरीन अदाकारी के लिए 2004 में सर्वश्रेष्ठ खलनायक का फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला। इसके बाद तो इरफान खान ने मुड़कर नहीं दिखा। उन्हें वह स्थान मिलने लगा, जो एक समय हिंदी सिनेमा के मंझे हुए कलाकार और काफी समय तक खलनायक रहे प्राण साहब के पास था।

अपनी अदाकारी से इरफान किसी भी फिल्म में जान डाल सकते थे, चाहे वह कितनी ही घिसी पिटी क्यों ना हो। शायद यह एक कारण था कि गुंडे जैसी औसत फिल्म भी इरफान खान जैसे अभिनेता के कारण कुछ दिन बॉक्स ऑफिस पर टिकी रही।

ये इरफान ही थे जिन्होंने हॉलीवुड में भारतीयों की पारंपरिक छवि को तोड़ते हुए कई अहम रोल अर्जित किए। चाहे वो द नेमसेक हो, लाइफ ऑफ पाई हो, इंफर्नो हो या फिर जुरासिक वर्ल्ड ही क्यों ना हो, इरफान ने भारत को हॉलीवुड में एक पहचान दिलाई।

परन्तु बॉलीवुड में वे इतने प्रसिद्ध नहीं थे। यदि शेक्सपीयर के सुप्रसिद्ध नाटक मैकबेथ पर आधारित मकबूल और रोग नामक फिल्म को छोड़ दें, तो इरफान साइड रोल तक ही अधिकतर सीमित रहते थे।

परन्तु यहां भी बदलाव हुआ, जब 2012 में तिग्मांशू धूलिया के निर्देशन में एक बार फिर वे सामने आए पान सिंह तोमर के किरदार में। कैसे एक पूर्व सैनिक और भारतीय खिलाड़ी अपने हाथ में कानून लेने को विवश हो जाता है, इसे इरफान ने ऐसे जिया, की उन्हें आलोचकों और दर्शकों, दोनों का ही भरपूर प्यार मिला।

ना कोई हीरो वाला सीक्वेंस, ना कोई मारधाड़, और ना ही कोई आइटम सॉन्ग, पर फिर भी पान सिंह तोमर इरफान खान की अदाकारी और उनके बेहतरीन संवादों के दम पर  बॉक्स ऑफिस पर छा गई। इस उत्कृष्ट रोल के लिए इरफान को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा गया।

अगले ही साल इरफान खान की एक और बेहतरीन फिल्म आई, द लंचबॉक्स। कान फिल्म फेस्टिवल में क्रिटिक्स चॉइस के पुरस्कार बटोरने वाली इस फिल्म ने अपनी सादगी से दर्शकों के दिलों को जीत लिया, और इरफान खान एक आम अकाउंटेंट के रोल में भी छा गए।

फिर क्या था, डी डे, तलवार, कारवां, हिंदी मीडियम जैसी फिल्मों में इन्होंने अपनी अदाकारी की बेमिसाल छाप छोड़ी। हिंदी मीडियम और कारवां में अपनी अदाकारी से ना सिर्फ उन्होंने लोगों को गुदगुदाया, अपितु काफी गंभीर प्रश्न भी समाज से पूछे।

इरफान की जिजीविषा ऐसी थी कि एंडोक्राइन ट्यूमर से जूझने के बावजूद उन्होंने अंग्रेज़ी मीडियम ना सिर्फ पूरी की, बल्कि अपने किरदार को जीवंत भी किया।

आज इरफान खान हमारे बीच नहीं है, पर अपने अदाकारी और अपने बेबाक व्यक्तित्व से उन्होंने भारतीय सिनेमा को कुछ अनमोल उपहार दिए हैं, जिन्हें सहेजना अब हमारा दायित्व है।

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